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टीबी से मिलते हैं लक्षण इसलिए अंडरडाइग्नोसड है वास्क्युलिटीस
वास्क्युलिटीस एंड रह्यूमेटोलॉजी इमर्जेन्सीज़ पर एक दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस हुई
इंदौर। देश में टीबी सामान्य बीमारी है, जिसके लक्षण वास्क्युलिटीस से बहुत मिलते हैं ये बहुत बड़ा कारण है कि देश में वास्क्युलिटीस बीमारी अंडरडाइग्नोसड और मिसडाइग्नोसड होती है । यह बात मुंबई से आए सीनियर डॉक्टर एस एन अमीन ने ‘वानस्क्युलिटीस एंड रह्यूमेटोलॉजी इमर्जेन्सीज़’ विषय पर शहर में हुई नेशनल कॉन्फ्रेंस में कही।
देश में वास्क्युलिटीस एंड रह्यूमेटोलॉजी में आने वाली इसी तरह की इमजेंसी कंडीशंस के लिए जनरल फिजिशयन्स को जागरूक और तैयार करने के उद्देश्य से होने वाली यह अपनी तरह की पहली कॉन्फ्रेंस थी। उन्होंने बताया अगर डॉक्टर मरीज के साथ उसकी तकलीफ को समझने में 20 से 25 मिनिट दे तो काफी सारी समस्याएं पहले ही ख़त्म हो सकती है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन इंदौर और एसोसिएशन ऑफ़ ओरथोपेडिक सोसायटी इंदौर द्वारा कराई जाने वाली इस कॉन्फ्रेंस में बच्चों में होने वाली रह्यूमेटिक डिसीज, गर्भावस्था के दौरान जोड़ों में होने वाली समस्याओं, वास्कोलाइटिस और सभी रह्यूमेटिक बीमारियों जैसे विषयों पर कॉन्फ्रेंस के सेक्रेटरी डॉ मालवीय ने बतायाकॉन्फ्रेंस में 350 डॉक्टर्स और 80 पीजी स्टूडेंट्स ने हिस्सा लिया, आज हमने इस कॉन्फ्रेंस में एक साथ शहर के विभिन्न बड़ी बीमारियों के दिग्गज डॉक्टर्स को इकठ्ठा किया जिसमें फिजिशियंस, कार्डिओलॉजिस्ट, नेफ्रोलॉजिस्ट और पैथोलॉजिस्ट गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट और सर्जन्स ख़ास है। हम डॉक्टरों में वास्कोलाइटिस की पहचान को बढ़ावा देने के साथ ही स्टूडेंट्स में अभी से जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे है। 70 स्टूडेंट्स ने 22 टीम्स में बटकर वास्क्युलिटीस की पहचान सम्बंधित विषय पर हुए क्विज में हिस्सा लिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ पी एस हार्डिया और एमजीएम कॉलेज के पूर्व डीन डॉ शरद थोरा थे।
जानलेवा साबित हो सकती है चूक
वेल्लोर से आए सीनियर डॉ देबाशीष दांडा ने बताया रक्त की नसों में सूजन को वास्कोलाइटिस कहते हैं। ये 35 प्रकार के होते हैं, जिसमें छोटी नसों का वास्क्युलिटीस, बड़ी नसों का वास्कोलाइटिस और आटरी का वास्क्युलिटीस प्रमुख है। कुछ वास्क्युलिटीस कुछ ही हफ़्तों में मरीज के अंगों को इतनी बुरी तरह प्रभावित करते हैं कि उनकी मृत्यु तक हो जाती है। इनके इलाज के लिए पहले हाई पावर की स्टेरॉइड्स दवाइयों का इस्तेमाल होता था, लेकिन समय के साथ दवाओं में बदलाव आया है अब बायोलॉजिकल्स प्लाज़्मा फेरेसिस आधी ट्रीटमेंट्स से मरीजों को अच्छा फायदा मिलता है। डॉ दांडा ने बताया ह्रदय के इन्फेक्शन या लेप्रोसी में किसी तरह का रिएक्शन होने पर वास्क्युलिटीस होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
दिल्ली मेदांता हॉस्पिटल के ह्यूमेटोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉक्टर राजीवा गुप्ता ने बताया ब्लड वेसल्स पुरे शरीर में होती है इसलिए वास्क्युलिटीस शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है। यह बीमारी किसी भी उम्र में शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है और इससे मल्टीपल ऑर्गन फेलियर भी हो सकता है। वास्क्युलिटीस का आसन ब्लड टेस्ट, एंजिओग्राफी या टिश्यू की बायोप्सी आदि जांचों से पता लगाया जा सकता है। कुछ तरह की वास्क्युलिटीस इन जांचों में भी पकड़ में नहीं आती, उनके लिए ऑर्गन सिस्टम की एक्टिविटीज को मॉनिटर करना जरुरी है।
डॉक्टर्स को बताया ध्यान दें इन लक्ष्यों पर कही ये वास्क्युलिटीस तो नहीं
- किसी मरीज का वजन तेज़ी कम हो रहा है जिसका जाँच में कोई कारण नहीं मिल रहा हो।
- लम्बा बुखार चल रहा है जिसका जाँच में कोई कारण नहीं मिल रहा।
- पैरों पर और पीठ के निचले हिस्से पर लाल चकते नजर आ रहे हो।
- दोनों हाथों से नापें गए बीपी की रीडिंग अलग आ रही हो।
- शरीर के अलग अलग हिस्सों से ली गई पल्स रेट अलग हो।
- नाक से खून आ रहा हो।
- मरीज लम्बें समय से अस्थमा का शिकार हो।
- स्टूल या खासी में खून आ रहा हो।


